धर्म और आस्था

त्रेतायुग में बना था शिवमंदिर देवतालाब – भगवान विश्वक्रर्मा ने रातों-रात किया था इस मंदिर का निर्माण, दिन में चार बार बदलता है स्वरूप

अर्जुन गुप्ता, पत्रकार व वरिष्ठ आर.टी.आई कार्यकर्ता

रीवा-वाराणसी मार्ग पर स्थित देवतालाब में एक पत्थर से बना भगवान भोलेनाथ का मंदिर देखने में जितना भव्य है, उसका धार्मिक व चमत्कारिक महत्व उतना ही अधिक है। भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना के लिए यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। सावन के महीने में शिव-अभिषेक के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि महादेव के कहने पर भगवान विश्वकर्मा ने इसे एक रात में बनाया था। त्रेतायुग में बने इस मंदिर का दिव्य शिल्पकाल भी इस बात का प्रमाण है। यह पूरा मंदिर एक विशाल पत्थर पर निर्मित है। मंदिर के शिवलिंग पर एक निशान है, जो सूर्य की दिशा अनुसार बदलता रहता है। शिवलिंग का आकार भी पहर के साथ परिवर्तन होने की चर्चा है। इन दिव्य घटनाओं के कई बार प्रमाण सही साबित हुए हैं। यही कारण है कि पूरे विंध्य में देवतालाब का मंदिर प्रसिद्ध है। वर्तमान में इस मंदिर की देखदेख प्रशासन कर रहा है।

रीवा शहर से 50 किलोमीटर दूर भगवान भोलेनाथ का अलौकिक शिवधाम देवतालाब शिव मंदिर स्थित है. इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वक्रर्मा ने रातों-रात किया था. इसको लेकर कई रोचक किस्से हैं। विंध्य क्षेत्र की धरती के अजब किस्से हैं, इस धरती में कई ऐसे रहस्य हैं, जिन्हें जानकर लोगों को हैरानी भी होती है, कि ऐसा कैसे हो सकता है. यहां कई ऐसी धरोहर हैं, जो सैकड़ों नहीं हजारों वर्षों से भी ज्यादा पुरानी हैं. आज हम बात करने जा रहे हैं, यहां पर स्थित आलौकिक शिवधाम की. जिसके निर्माण की कहानी त्रेयता युग से जुड़ी हुई है. इस पवित्र शिवधाम का नाम देवतालाब है. यहां पर एक विशाल शिव मंदिर है. जिसे एक बड़े से चट्टान को उकेर कर बनाया गया था. इसका निर्माण भगवानों के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने खुद एक रात में किया था. कहा जाता है कि चारोधाम की यात्रा करने के बाद श्रद्धालु इस दिव्य मंदिर में पहुंचकर जब तक भगवान शिव के दर्शन नहीं कर लेते, तब तक उनकी चारों धाम की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।

रीवा से 50 किलोमीटर दूर स्थित है आलौकिक शिवधाम

शिव की नगरी कहे जाने वाले देव तालाब का आलौकिक शिव धाम रीवा शहर से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस मंदिर में श्रृंगेश्वर नाथ रूपी शिवलिंग स्थापित है. जिसे सोमनाथ के रूप में भी जाना जाता है. बडी संख्या में देश विदेश से श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन करने देवतालाब मंदिर आते हैं. श्रावण, अगहन और फाल्गुन मास में बड़ी संख्या में भक्त भगवान शिव के दर्शन करने देवतालब पहुंचते हैं।

त्रेता युग में इसी स्थान पर श्रृंगीऋषि ने की थी तपस्या
किवदंतियां हैं कि, देवतालाब का यह शिव धाम त्रेता युग के समय का है. त्रेयता युग के समय में भगवान भोलेनाथ के परम भक्त श्रृंगीऋषि इस क्षेत्र में आए थे, तब इस स्थान पर घना जंगल हुआ करता था. उन्होंने यहीं पर रूककर भगवान शिव की अराधना की और तस्पया में लीन हो गए. इसके बाद स्वयं भगवान शिव ने श्रृंगीऋषि को साक्षात दर्शन दिए, तभी एक शिवलिंग प्रकट हुई. जिसके बाद भगवान शिव ने श्रृंगीऋषि को इसी स्थान पर मंदिर बनवाने के लिए निर्देशित किया।

भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था भव्य मंदिर का निर्माण

श्रृंगीऋषि ने भगवानों के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को अमंत्रित किया. जिसके बाद स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक विशाल चट्टान को तराश कर एक ही रात में बेजोड़ भव्य मंदिर का निर्माण किया था. उसी दौरान भगवान विश्वकर्मा ने मंदिर के चारों ओर तालाबों का निर्माण किया, ताकि भक्त मंदिर में आकार भगवान शिव का जलाभिषेक कर सकें. इन्हीं तलाबों की वजह से शिव के इस नगरी का नाम देवतालाब पड़ा. कहा जाता है कि, भगवान भोलेनाथ के इस दिव्य देवतालाब मंदिर के अंदर जो श्रृंगेश्वर नाथ रूपी शिवलिंग है, उसका का रंग दिन में चार बार बदलता है।

मंदिर के नीचे दूसरा मंदिर

जानकार बताते हैं कि, जिस देवतालाब मंदिर के गर्भगृह में श्रृंगेश्वर नाथ शिवलिंग स्थापित है. उसके ठीक नीचे शिव का एक और मंदिर स्थापित है. वहां पर पहुंचने के लिए मंदिर के ठीक सामने से एक रास्ता जाता था, जो वर्षों पहले ही बंद हो चुका है. उसी स्थान पर खजाने के साथ ही एक चमत्कारिक मणि भी मौजूद है. जिसकी रक्षा स्वयं नाग देवता करते है. कई वर्षों पूर्व मंदिर के तहखाने से खतरनाक जीव जंतु निकलने लगे, जिसके बाद से उसका दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

औरंगजेब के सेना ने की थी शिवलिंग को खंडित करने की कोशिश

कहा जाता है कि, मुगल शासक औरंगजेब के शासन काल में उसकी सेना देवतालाब पहुंच गई थी. सेना ने मंदिर में विराजित भगवान श्रृंगेश्वर नाथ रूपी शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास भी किया था. जिसके बाद ही उसका शर्वनाश हो गया था. ऐसा कहते हैं कि, जब मुगल सेना ने शिवलिंग को तोड़ने के लिए शिवलिंग में प्रहार किया, तो उसमें तीन दरारें पड़ गई और एक दरार से खून तो दूसरे दरार से दूध. वहीं तीसरी दरार से गंगा की धारा निकल पड़ी. तब से ही यहां पर भगवान भोलेनाथ के श्रृंगेश्वर नाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा.

रीवा रियासत के महराजाओं ने भी करवाया मंदिर में विकास कार्य

इतिहास में यह भी दर्शाया गया है कि भगवान विश्वकर्मा ने भोलेनाथ के इस मंदिर को स्वयं आकार दिया. उसके बाद रीवा रियासत के महाराजा ने भी मंदिर में कई विकास कार्य करवाए. उन्होंने मंदिर के गर्भ गृह में स्थित मुख्य शिवलिंग के पास ही चार अन्य शिवलिंग स्थापित करवाए और मंदिर के बाहर चारों दिशाओं में चार अन्य मंदिरों का भी निर्माण कराया।

देवतालाब में शिव के दर्शन किए बगैर नहीं पूरी होती चारोधाम की यात्रा

देवतालाब शिव मंदिर की एक मान्यता यह भी है कि, देवतालाब मंदिर में विराजमान श्रृंगेश्वर नाथ भगवान के दर्शन किए बगैर चारोधाम की यात्रा को सफल नहीं माना जाता. क्योंकि यह भोलेनाथ के सभी रूपों में जेष्ठ रूप है. यहां ऐसी प्रथा है की चारोधाम की यात्रा करने के बाद श्रद्धालु देवतालाब मंदिर आते हैं और भगवान भोलेनाथ को रोट का प्रसाद चढ़ाते है. इसके बाद ही चारोधाम की यात्रा सफल मानी जाती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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