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हिमालय में बढ़ रहा ‘जल बम’ का खतरा! ग्लेशियर झीलों का तेजी से फैलाव, 601 झीलों का आकार दोगुने से ज्यादा

✍️ तेजस्वी न्यूज - सबसे तेज

इसरो के सैटेलाइट अध्ययन ने बढ़ाई चिंता: भारतीय हिमालयी नदी घाटियों की 676 झीलों में दर्ज हुआ बड़ा विस्तार, 130 झीलें भारत की सीमा में

नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव का एक और गंभीर संकेत सामने आया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सैटेलाइट आंकड़ों के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में अध्ययन की गई 676 ग्लेशियर झीलों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया गया है, जिनमें 130 झीलें सीधे भारत की सीमा के भीतर स्थित हैं।

इसरो के दीर्घकालिक सैटेलाइट आंकड़ों के मुताबिक, उच्च हिमालयी एशिया (HMA) में वर्ष 2016-17 से अब तक ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल करीब 5.5 प्रतिशत बढ़ चुका है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और उनके पीछे हटने से नई झीलें बन रही हैं तथा पहले से मौजूद झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन झीलों के प्राकृतिक तटबंध कमजोर होने की स्थिति में अचानक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी भयावह घटनाएं हो सकती हैं।

601 झीलें हुईं दोगुने से ज्यादा बड़ी

अध्ययन में सामने आया कि विस्तार दर्ज करने वाली 676 झीलों में से 601 झीलों का क्षेत्रफल अपने मूल आकार से दोगुने से भी अधिक हो चुका है। वहीं 10 झीलों का आकार 1.5 से 2 गुना और 65 झीलों का क्षेत्रफल 1.5 गुना तक बढ़ा है।

ऊंचाई के लिहाज से भी स्थिति चिंताजनक है। इनमें 314 झीलें 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं, जबकि 296 झीलें 5,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मौजूद हैं। इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान और मौसम में होने वाले बदलाव ग्लेशियरों तथा झीलों की स्थिरता को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।

पूर्वी हिमालय सबसे ज्यादा संवेदनशील

अध्ययन के अनुसार पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों के विस्तार की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर नजर आ रही है। इस क्षेत्र में इन झीलों का कुल क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर तक बढ़ा है।

इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र में 80 हजार से अधिक भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। भारी बारिश, चट्टानों के खिसकने और पहाड़ी ढलानों के टूटने से ग्लेशियर झीलों के प्राकृतिक तटबंधों पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में यदि कोई झील अचानक टूटती है तो नीचे की ओर बसे गांवों, शहरों, सड़कों, पुलों और नदी घाटियों में कुछ ही समय में भारी तबाही मच सकती है।

केदारनाथ और सिक्किम जैसी त्रासदियों का खतरा

ग्लेशियर झीलों का बढ़ता आकार और हिमालय में लगातार हो रही भूस्खलन की घटनाएं भविष्य में अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ा रही हैं। केदारनाथ और सिक्किम जैसी घटनाओं ने पहले ही यह दिखा दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएं कितनी तेजी से विकराल रूप ले सकती हैं।

सैटेलाइट से सामने आई यह तस्वीर सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने की कहानी नहीं, बल्कि हिमालयी नदी घाटियों में बढ़ते संभावित ‘जल बम’ की चेतावनी भी है। समय रहते संवेदनशील झीलों की निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की तैयारियां मजबूत करना बेहद जरूरी हो गया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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