महानदी तट पर विराजी मां चंद्रहासिनी: आस्था, इतिहास और चमत्कारों का अद्भुत संगम
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52 शक्तिपीठों में शामिल मां चंद्रहासिनी धाम, हर मनोकामना होती है पूरी
चंद्रपुर। छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के चंद्रपुर स्थित मां चंद्रहासिनी धाम सदियों से करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। महानदी के पावन तट पर स्थित यह मंदिर केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि अपने प्राचीन इतिहास, लोकमान्यताओं और चमत्कारों के कारण भी विशेष पहचान रखता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में मां चंद्रसेनी देवी सरगुजा की भूमि छोड़कर रायगढ़ होते हुए महानदी के तट पर चंद्रपुर पहुंचीं। महानदी के शांत और शीतल वातावरण से प्रभावित होकर माता यहीं विश्राम करने लगीं और गहरी निद्रा में लीन हो गईं। कहा जाता है कि कई वर्षों तक उनकी निद्रा भंग नहीं हुई। इसी दौरान संबलपुर (ओडिशा) के राजा की सवारी वहां से गुजरी। अनजाने में राजा का पैर विश्राम कर रहीं माता से स्पर्श हो गया, जिससे माता जागृत हुईं। उसी रात देवी ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर उसी स्थान पर भव्य मंदिर बनाकर अपनी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। राजा ने देवी की आज्ञा का पालन करते हुए मंदिर का निर्माण कराया और तभी से मां चंद्रहासिनी धाम श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया।

यहां माता अपने बराही स्वरूप में विराजमान हैं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रहासिनी धाम को 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का पवित्र अंग गिरा था, जिसके कारण यह स्थान सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है। यहां माता अपने बराही स्वरूप में विराजमान हैं। मंदिर परिसर में माता की छोटी बहन नाथलदाई का मंदिर भी स्थित है, जो महानदी के मध्य स्थित होने के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मां चंद्रहासिनी मंदिर की एक अनोखी परंपरा भी देशभर में प्रसिद्ध है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की कामना से मंदिर की दीवार पर सिक्का चिपकाते हैं। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत माता अवश्य पूरी करती हैं। नवरात्रि, चैत्र और शारदीय पर्वों के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मां चंद्रहासिनी धाम आज भी आस्था, विश्वास और सनातन संस्कृति की दिव्य पहचान के रूप में पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के भक्तों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।




