ढाई हजार साल पुराना हैं यह शनि नव ग्रह मंदिर, राजा विक्रमादित्य ने की थी इस मंदिर की स्थापना, यहां पूजा करने से साढ़ेसाती हो जाती हैं समाप्त
अर्जुन गुप्ता, पत्रकार व वरिष्ठ आर.टी.आई. कार्यकर्ता

उज्जैन के शनि नव ग्रह मंदिर का इतिहास 2500 साल पुराना है, इस मंदिर की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने की थी. राजा के ऊपर शनि की साढ़ेसाती जैसे ही खत्म हुई और शनि महाराज उन पर प्रसन्न हुए उसके बाद इस मंदिर का निर्माण राजा की ओर से करवाया गया, इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं

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उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन के शनि नव ग्रह मंदिर उज्जैन सांवेर इंदौर मार्ग पर शिप्रा के त्रिवेणी संगम पर स्थित हैं, यहां देश विदेश के श्रद्धालु आते हैं, इस मंदिर का इतिहास राजा विक्रमादित्य से जुड़ा हुआ हैं। यहां पर मुख्य शनिदेव की प्रतिमा के साथ-साथ ढय्या शनि की भी प्रतिमा भी स्थापित है. बताया जाता है कि राजा विक्रमादित्य का इतिहास भी इस मंदिर से जुड़ा हुआ है. यही नहीं, यह शनि मंदिर पहला मंदिर भी है, जहां शनिदेव शिव के रूप विराजमान हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाते हैं. कहा जाता है कि यहां साढ़ेसाती और ढय्या की शांति के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि यहां पूजा करने से साढ़ेसाती समाप्त हो जाती है।

विक्रमादित्य ने इस मंदिर के बनाने के बाद ही विक्रम संवत की शुरुआत की थी
यह मंदिर 2500 वर्ष पुराना है. राजा विक्रम आदित्य की जब साढ़ेसाती खत्म हुई थी. तो शनि महाराज राजा पर प्रसन्न हुए और यहां सारे गृह एक साथ प्रकट हुए. इसे शनि मंदिर में एक साथ विराजमान हुए, तभी से इस मंदिर में लोगों की आस्था हैं। कहा जाता है कि विक्रमादित्य ने इस मंदिर के बनाने के बाद ही विक्रम संवत की शुरुआत की थी।

शिव के रूप विराजमान हैं शनिदेव
यहां पर मुख्य शनिदेव की प्रतिमा के साथ-साथ ढय्या शनि की भी प्रतिमा भी स्थापित है। बताया जाता है कि विक्रम संवत का इतिहास भी इस मंदिर से जुड़ा हुआ है। यही नहीं, यह शनि मंदिर पहला मंदिर भी है, जहां शनिदेव शिव के रूप विराजमान है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि यहां साढ़ेसाती और ढय्या की शांति के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाया जाता है।

श्रद्धालु शिव रूप में शनिदेव को तेल करते हैं प्रसन्न
बताया जाता है कि शनि अमावस्या के दिन यहां 5 क्विंटल से अभी तेल शनिदेव पर चढ़ता है। मंदिर प्रशासन को इसके लिए कई टंकी की व्यवस्था करना पड़ता है। बाद में इस तेल को निलाम किया जाता है। माना जाता है कि शनि अमावस्या दे दिन श्रद्धालु शिव रूप में शनिदेव को तेल चढ़ाकर प्रसन्न करते हैं। कहा जाता है कि जो भी यहां सच्चे मन से शनिदेव को प्रसन्न करता है उसे शनिदेव कभी दुख नहीं देते हैं, सारे कष्ट दूर कर देते हैं।







